ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ता सैन्य संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जहाँ अमेरिका की सीधी भागीदारी ने इसे और भी जटिल बना दिया है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर भारत पर भी पड़ेगा, खासकर हमारी अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक संबंधों पर। बिहार जैसे राज्यों में भी इसका असर अप्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है।
1. महंगाई का ‘तेल’ बम और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट
भारत अपनी 80% से ज़्यादा ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, और इसका एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है।
- कच्चे तेल की कीमतें: युद्ध बढ़ने से वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 81 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। अगर यह संघर्ष और गहराता है, खासकर अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी को अंजाम देता है (जो वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा है), तो कीमतें आसमान छू सकती हैं।
- पेट्रोल-डीजल महंगा: तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर पड़ेगा। इससे माल ढुलाई महंगी होगी और आम आदमी की जेब पर सीधा बोझ पड़ेगा, जिससे महंगाई बढ़ेगी।
- आर्थिक मंदी का खतरा: ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतें और अनिश्चित आपूर्ति भारत में आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ा सकती हैं, क्योंकि यह उद्योगों और परिवहन पर सीधा असर डालती हैं।
2. व्यापारिक मोर्चे पर चुनौती: 3.6 लाख करोड़ का व्यापार खतरे में
यह युद्ध भारत के व्यापारिक संबंधों, विशेषकर पश्चिम एशियाई देशों के साथ, को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
- व्यापारिक मार्ग प्रभावित: लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग इस संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। जहाजों की आवाजाही पर रोक या सुरक्षा चिंताओं के कारण माल ढुलाई की लागत (शिपिंग और बीमा प्रीमियम) बढ़ जाएगी। कई भारतीय कंपनियाँ अब अफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाकर ‘केप ऑफ गुड होप’ से माल भेज रही हैं, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।
- निर्यात पर असर: ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, ईरान और इजराइल के साथ भारत का लगभग 3.6 लाख करोड़ रुपये (41.7 अरब डॉलर) का व्यापार खतरे में है।
- ईरान: भारत ईरान को बासमती चावल, चाय, दवाएं और अन्य उत्पाद निर्यात करता है। युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान के साथ व्यापार में बड़ी रुकावट आ सकती है।
- इज़राइल: इज़राइल के साथ भारत का व्यापार भी प्रभावित होगा, खासकर हीरे, मशीनरी और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में।
- पश्चिम एशिया का व्यापार: इराक, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और यमन जैसे अन्य पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत का लगभग 8.6 अरब डॉलर का निर्यात और 33.1 अरब डॉलर का आयात भी प्रभावित हो सकता है।
- ऊन उद्योग पर असर: राजस्थान के बीकानेर का ऊन उद्योग, जो ईरान से बड़ी मात्रा में ऊन आयात करता है, पहले ही संकट में है क्योंकि युद्ध के कारण ईरान से ऊन की आपूर्ति रुक गई है।
3. रुपया और वित्तीय स्थिरता पर दबाव
युद्ध के हालात में, विदेशी निवेशक अक्सर सुरक्षित ठिकानों की ओर रुख करते हैं, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव आ सकता है। रुपये के कमजोर होने से आयात और महंगा होगा, जिससे देश का राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है और सरकार की वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
4. विदेश नीति की अग्निपरीक्षा
भारत के लिए यह स्थिति एक जटिल कूटनीतिक चुनौती है।
- संतुलित संबंध: भारत के अमेरिका और इज़राइल दोनों के साथ मजबूत संबंध हैं, साथ ही ईरान के साथ भी उसके ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते रहे हैं (जैसे चाबहार बंदरगाह परियोजना)। ऐसे में भारत को एक संतुलित विदेश नीति अपनानी होगी, ताकि किसी भी पक्ष के साथ संबंधों को नुकसान न पहुंचे।
- नागरिकों की सुरक्षा: इज़राइल में लगभग 18,000 और ईरान में लगभग 10,000 भारतीय नागरिक मौजूद हैं। संघर्ष बढ़ने पर इन नागरिकों की सुरक्षा और उन्हें सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी भी भारत पर होगी। भारत ने पहले भी ‘ऑपरेशन सिंधु’ जैसे बचाव अभियान चलाए हैं।
5. बिहार पर अप्रत्यक्ष प्रभाव
- उत्पाद महंगे: भले ही बिहार सीधे तौर पर व्यापारिक संबंधों में शामिल न हो, लेकिन देश भर में बढ़ती महंगाई और ऊर्जा की ऊंची कीमतें बिहार में भी रोजमर्रा की वस्तुओं और परिवहन लागत को बढ़ा देंगी।
- प्रवासियों पर असर: बिहार के कई लोग रोजगार के लिए मध्य पूर्व के देशों में रहते हैं। संघर्ष बढ़ने पर उनकी सुरक्षा और उनके परिवारों पर भी असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, ईरान-इज़राइल युद्ध भारत के लिए एक गंभीर चुनौती है, जिसका आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर गहरा असर पड़ेगा। भारत सरकार को इस स्थिति से निपटने के लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाने और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होगी।
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