badltabihar.in पर एक बार फिर आपका स्वागत है! बिहार के हर कोने से जुड़ी जानकारी आप तक पहुँचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। आज हम आपको सीवान जिले के एक छोटे से लेकिन ऐतिहासिक महत्व रखने वाले गाँव भिखपुर के मोहर्रम की ख़ासियत बताने जा रहे हैं। भिखपुर में मोहर्रम सिर्फ़ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, गहरी अकीदत और बेजोड़ सांप्रदायिक सौहार्द का जीता-जागता उदाहरण है, जो पूरे सीवान जिले के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
भिखपुर का मोहर्रम: एक अनूठी विरासत
भिखपुर, सीवान जिले के उन चुनिंदा स्थानों में से एक है जहाँ मोहर्रम को बेहद पारंपरिक और अनूठे ढंग से मनाया जाता है। यहाँ मोहर्रम, इस्लामी कैलेंडर के पहले महीनेयह पर्व इमाम हुसैन की कुर्बानी की स्मृति में मनाया जाता है, जिसमें गम, समर्पण और बलिदान की भावना प्रमुख होती है, लेकिन भिखपुर में इसकी अद्वितीय परंपराएँ इसे और भी खास बना देती हैं।,
पुरातन ताज़िए और उनकी भव्यता: भिखपुर के मोहर्रम की सबसे बड़ी पहचान यहाँ के पारंपरिक ताज़िए हैं। ये ताज़िए सिर्फ़ कलाकृति नहीं, बल्कि इतिहास और अकीदत का प्रतीक होते हैं। इन्हें बनाने में विशेष कारीगरी का इस्तेमाल होता है, और कई ताज़िए तो सदियों पुराने डिजाइनों पर आधारित होते हैं। जुलूस के दौरान इनकी भव्यता और चमक देखते ही बनती है, जो दूर-दूर से लोगों को अपनी ओर खींचती है।
- अखाड़ों की जीवंत परंपरा: सीवान के अन्य हिस्सों की तरह, भिखपुर में भी मोहर्रम के दौरान अखाड़ों की परंपरा बेहद जीवंत है। यहाँ के युवा लाठी, तलवार, और अन्य पारंपरिक हथियारों के साथ अद्भुत करतब और शौर्य का प्रदर्शन करते हैं। ये अखाड़े केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि इमाम हुसैन और उनके साथियों के साहस और बलिदान की याद दिलाते हैं। इन अखाड़ों के प्रशिक्षण में महीनों लग जाते हैं, और इनमें स्थानीय युवा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
- ग्रामीण परिवेश में एकता का संदेश: भिखपुर एक ग्रामीण क्षेत्र है, और यहाँ के मोहर्रम में ग्रामीण सादगी और एकजुटता का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। पूरे गाँव के लोग, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों, इस आयोजन में किसी न किसी रूप में अपनी भागीदारी निभाते हैं। यह दिखाता है कि ग्रामीण बिहार में आज भी आपसी भाईचारा और सौहार्द कितना मजबूत है।
हिंदू-मुस्लिम एकता का बेजोड़ उदाहरण: भिखपुर की गंगा-जमुनी तहज़ीब
भिखपुर के मोहर्रम को जो बात सबसे ख़ास बनाती है, वह है हिंदू समुदाय की सक्रिय भागीदारी। यह सीवान की उस समृद्ध गंगा-जमुनी तहज़ीब का बेजोड़ नमूना है, जहाँ धार्मिक सीमाएँ आपसी प्रेम और सम्मान के आगे धुँधली पड़ जाती हैं:
- ताज़िया निर्माण में सहभागिता: कई हिंदू परिवार भी मोहर्रम के ताज़िए बनाने और सजाने में मुस्लिम भाइयों के साथ मिलकर काम करते हैं। यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ धर्म नहीं, बल्कि आपसी सौहार्द और परंपरा का पालन ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
- जुलूसों में भागीदारी और सेवा: मोहर्रम के जुलूसों में न सिर्फ़ मुस्लिम बल्कि बड़ी संख्या में हिंदू भी शामिल होते हैं। वे मातम में शरीक होते हैं, और कई जगहों पर तो जुलूस में शामिल लोगों के लिए पानी, शरबत या अन्य व्यवस्थाएँ भी हिंदू समुदाय के लोग ही करते हैं।
- मठों और मंदिरों में ताज़ियों का प्रवेश: कुछ स्थानों पर यह भी देखा जाता है कि मोहर्रम के ताज़िए हिंदू मठों या मंदिरों के पास से गुज़रते हैं, और कई बार तो उन्हें थोड़ी देर के लिए वहां रखा भी जाता है। इस दौरान दोनों समुदायों के लोग मिलकर दुआएँ करते हैं और इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह दृश्य सीवान के भाईचारे और सांस्कृतिक सहिष्णुता की एक अनूठी तस्वीर पेश करता है।
व्यवस्था और शांति का संकल्प:
मोहर्रम के दौरान किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए स्थानीय प्रशासन, पुलिस और शांति समिति के सदस्य लगातार सक्रिय रहते हैं। जुलूसों के मार्गों को निर्धारित किया जाता है, सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जाती है और दोनों समुदायों के प्रमुख लोगों के साथ बैठकें कर शांतिपूर्ण आयोजन सुनिश्चित किया जाता है। भिखपुर में भी यह व्यवस्था बेहद चाक-चौबंद रहती है, जिससे पर्व हमेशा सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न होता है।
भिखपुर का मोहर्रम हमें याद दिलाता है कि आस्था और परंपराएँ लोगों को जोड़ने का काम करती हैं, तोड़ने का नहीं। यह सीवान की उस समृद्ध विरासत का हिस्सा है, जिस पर हर बिहारी को गर्व है। badltabihar.in पर हम ऐसी ही प्रेरक कहानियों और बिहार के बदलते स्वरूप को आप तक पहुँचाते रहेंगे।