सीवान में मोहर्रम: शहादत, अकीदत और तहज़ीब का प्रतीक

मोहर्रम: इस्लामी कैलेंडर का आगाज़ और इमाम हुसैन की शहादत का महीना

मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला और सबसे पवित्र महीना है। इसकी शुरुआत ही त्याग और बलिदान की एक महान गाथा से होती है। इस महीने का दसवाँ दिन, जिसे आशुरा कहा जाता है, इस्लामी इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दुखद घटना के लिए याद किया जाता है। यह वह दिन है जब पैगंबर मुहम्मद के नवासे, इमाम हुसैन और उनके 72 वफादार साथियों ने कर्बला के मैदान में सत्य, न्याय और मानवता के उच्च आदर्शों को बचाने के लिए अपनी शहादत दी थी। सीवान समेत दुनिया भर के करोड़ों मुस्लिम इस शहादत को याद करते हुए गहरे मातम में डूब जाते हैं। यह महीना शोक, आत्म-चिंतन, इबादत और भौतिक सुखों से दूर रहकर आत्म-शुद्धि पर ज़ोर देने का प्रतीक है। इस दौरान लोग इमाम हुसैन और उनके परिवार की कुर्बानियों को याद करते हुए मजलिसों (शोक सभाओं) का आयोजन करते हैं।

सीवान में ताज़िए, अखाड़े और अकीदत भरे जुलूसों का रिवाज़

सीवान में मोहर्रम के दौरान ताज़िए निकालना एक सदियों पुरानी और बेहद महत्वपूर्ण परंपरा है। ये ताज़िए प्रतीकात्मक रूप से इमाम हुसैन की क़ब्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें बांस, रंगीन कागज़, ज़री और अन्य सजावटी सामानों से अत्यंत निपुणता और कलात्मकता के साथ तैयार किया जाता है। छोटे बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर कोई इन ताज़ियों को बनाने और सजाने में अपना योगदान देता है। ये ताज़िए स्थानीय मुहल्लों और गांवों में तैयार किए जाते हैं, और फिर उन्हें इमामबाड़ों से विशाल जुलूसों की शक्ल में निकाला जाता है।

  • मातम और जुलूस: मोहर्रम की 8वीं, 9वीं और 10वीं तारीख़ को सीवान के विभिन्न हिस्सों से बड़े पैमाने पर गवारा जुलूस (मातम के जुलूस) निकाले जाते हैं। ढोल-ताशे और नोहे (शोक गीत) की गूँज के साथ निकलने वाले ये जुलूस इमाम चौक या कर्बला के मैदान में समाप्त होते हैं। इन जुलूसों में शिया और सुन्नी दोनों ही समुदाय के लोग, काले लिबास में, इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए ‘या हुसैन, या अली’ और ‘दस्तों से सीना कूबी’ (हाथों से सीना पीटना) करते हुए मातम करते हैं। कुछ समर्पित अनुयायी प्रतीकात्मक रूप से जंजीरी मातम भी करते हैं, जो इमाम हुसैन और उनके साथियों द्वारा झेले गए कष्टों के प्रति अपनी गहरी संवेदना और एकजुटता व्यक्त करने का एक तरीका है।
  • अखाड़े और शौर्य प्रदर्शन: कई जगहों पर, विशेषकर सीवान के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में, मोहर्रम के जुलूसों के दौरान अखाड़ों का आयोजन एक ख़ास आकर्षण होता है। इनमें युवा और प्रशिक्षित कलाकार लाठी, तलवार, भाले, और अन्य पारंपरिक हथियारों के साथ अद्भुत करतब और कौशल का प्रदर्शन करते हैं। यह शौर्य प्रदर्शन सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं होता, बल्कि यह कर्बला के शहीदों के साहस, बहादुरी और अन्याय के सामने न झुकने की भावना को भी दर्शाता है। इन अखाड़ों में प्रशिक्षण कई महीनों पहले से शुरू हो जाता है।
  • सांप्रदायिक सद्भाव का अप्रतिम उदाहरण: सीवान में मोहर्रम की सबसे अनूठी और हृदयस्पर्शी विशेषता यह है कि हिंदू समुदाय भी इस पर्व में सक्रिय रूप से भाग लेता है। कई गांवों और कस्बों में हिंदू परिवार अपने घरों में मोहर्रम के ताज़िए बनाते हैं, उनकी सजावट में मदद करते हैं और जुलूसों में भी श्रद्धापूर्वक शामिल होते हैं। कुछ जगहों पर तो यह भी देखा जाता है कि ताज़िए हिंदू धार्मिक स्थलों, जैसे मठों या मंदिरों के पास से गुज़रते हैं, या कुछ समय के लिए वहां रखे भी जाते हैं, जहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग मिलकर इमाम हुसैन की याद में मजलिसों और दुआओं में शामिल होते हैं। यह सीवान की दशकों पुरानी सांस्कृतिक एकता, आपसी भाईचारे और सौहार्द का एक स्पष्ट प्रमाण है, जहाँ धार्मिक पहचान से बढ़कर मानवीय संवेदना और आपसी सम्मान को महत्व दिया जाता है। यह बिहार की उस महान परंपरा को दर्शाता है जहाँ सभी धर्मों के लोग मिलकर एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते हैं।

प्रशासन की भूमिका और शांतिपूर्ण आयोजन सुनिश्चित करना:

मोहर्रम जैसे संवेदनशील पर्व के दौरान शांति और व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। सीवान का जिला प्रशासन इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाता है। संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाता है और सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जाती है। पर्व से पहले, शांति समिति की बैठकें आयोजित की जाती हैं, जिनमें दोनों समुदायों के प्रमुख लोगों को शामिल किया जाता है ताकि किसी भी तरह की ग़लतफ़हमी या तनाव को समय रहते दूर किया जा सके। जुलूसों के लिए निर्धारित मार्ग और समय तय किए जाते हैं, और ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए डीजे जैसे उपकरणों पर प्रतिबंध जैसे नियम लागू किए जाते हैं। इन सब प्रयासों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यह पवित्र पर्व शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हो सके।

मोहर्रम का संदेश:

सीवान में मोहर्रम का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या शोक का महीना नहीं है, बल्कि यह अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाने, सत्य के लिए किसी भी हद तक बलिदान देने, और मानवता के उच्च मूल्यों को हर कीमत पर बनाए रखने का शाश्वत संदेश देता है। यह सीवान की विविधता में एकता की भावना को पुष्ट करता है, जहाँ विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर दुःख और संवेदना के इस पर्व को मनाते हैं, और एक-दूसरे के प्रति सम्मान और समझ का प्रदर्शन करते हैं।

badltabihar.in पर हम सीवान की ऐसी ही अनूठी परंपराओं, इसके बदलते सामाजिक ताने-बाने और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आपके सामने लाते रहते हैं। हमारा प्रयास है कि बिहार की हर अच्छी बात को दुनिया तक पहुँचाया जाए।

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