भारत की पावन भूमि पर अनेक त्योहार और ऋतुएँ आती हैं, जो जीवन में नए रंग भर देती हैं, मन को शांति और उत्साह से भर देती हैं। इन्हीं में से एक है सावन का महीना, जिसे श्रावण मास भी कहते हैं। यह न केवल प्रकृति को हरे-भरे आवरण से ढक देता है, बल्कि भगवान शिव की आराधना का भी विशेष अवसर लेकर आता है। बदलता बिहार की ओर से हम आपको सावन की महिमा, इसके धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व से विस्तार से परिचित कराते हैं।
सावन, हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष का पांचवां महीना होता है। यह अक्सर जुलाई के मध्य से शुरू होकर अगस्त के मध्य तक चलता है। इस दौरान भारत में मानसून अपनी पूरी छटा बिखेरता है। आकाश में घने बादल छा जाते हैं, बिजली कड़कती है और मूसलाधार वर्षा होती है। यह वर्षा सूखे खेतों को जीवनदान देती है, जिससे हरियाली चारों ओर अपनी चादर बिछा देती है। वातावरण शीतल और मनमोहक हो जाता है, जिससे मन में एक अजीब सी शांति और प्रसन्नता का अनुभव होता है। नदियाँ और झरने अपने पूर्ण वेग से बहते हैं, मानो प्रकृति भी अपनी खुशी का इजहार कर रही हो। सावन का महीना वास्तव में प्रकृति के पुनरुत्थान और नवजीवन का प्रतीक है।
शिव भक्ति का अटूट संगम: पावन सोमवार और कांवड़ यात्रा
सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला था, तो भगवान शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिससे उन्हें ‘नीलकंठ’ कहा गया। देवों ने विष के ताप को शांत करने के लिए उन पर जल अर्पित किया था, और यह घटना सावन मास में हुई थी। इसलिए, इस पूरे महीने भगवान शिव पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, माता सती ने अपने अगले जन्म में देवी पार्वती के रूप में भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए सावन मास में कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसलिए, यह महीना शिव और शक्ति के अटूट मिलन का भी प्रतीक है।
सावन के प्रत्येक सोमवार का व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भक्त सुबह से ही मंदिरों में पहुँच जाते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र, चंदन और फूल चढ़ाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। कुंवारी लड़कियाँ अच्छे और मनचाहे वर की कामना करती हैं, तो विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। ‘ॐ नमः शिवाय‘ और ‘महामृत्युंजय मंत्र‘ के जाप से पूरा वातावरण शिवमय हो उठता है।
सावन की एक और महत्वपूर्ण परंपरा कांवड़ यात्रा है। लाखों शिव भक्त, जिन्हें कांवड़िए कहते हैं, पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा नदी के किनारे स्थित धार्मिक स्थलों जैसे हरिद्वार, गंगोत्री, सुल्तानगंज आदि से पैदल चलकर जल भरते हैं। इस पवित्र गंगाजल को वे अपने कंधों पर ‘कांवड़’ में रखकर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं और अपने क्षेत्र के शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। यह यात्रा न केवल शारीरिक तपस्या का प्रतीक है, बल्कि यह अटूट आस्था, भक्ति, त्याग और भाईचारे का भी अद्भुत उदाहरण है। कांवड़ यात्रा के दौरान ‘बोल बम‘ के जयकारे से पूरा मार्ग गुंजायमान रहता है।
प्रकृति, संस्कृति और त्योहारों का मेल: हरियाली तीज और झूले
सावन का महीना केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह हमें प्रकृति के करीब आने का अवसर देता है। बारिश की बूँदें, मिट्टी की सोंधी खुशबू, हरे-भरे खेत और पेड़-पौधे मन को शांति और ताजगी प्रदान करते हैं। यह हमें पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है कि हमें अपनी प्रकृति का सम्मान और उसकी रक्षा करनी चाहिए।
सावन मास में अनेक छोटे-बड़े त्योहार भी मनाए जाते हैं, जिनमें हरियाली तीज प्रमुख है। यह त्योहार सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष होता है। वे इस दिन नए वस्त्र धारण करती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं और अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। हरियाली तीज पर महिलाएँ पेड़ों पर झूले डालकर, गीत गाकर और नृत्य कर खुशियाँ मनाती हैं। यह त्योहार महिलाओं के उत्साह और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक है। इसके अलावा, रक्षा बंधन भी सावन मास के अंत में आता है, जो भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है।
सावन का महीना जीवन में एक नई ऊर्जा और ताजगी लेकर आता है। यह हमें आध्यात्मिकता, प्रकृति से जुड़ाव और पारिवारिक मूल्यों की ओर प्रेरित करता है। badltabihar.in की ओर से हम कामना करते हैं कि यह पावन सावन मास आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और हरियाली लेकर आए।